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Saturday, April 30, 2022

श्रीमद्भगवद्गीता: समसामयिक जीवन में प्रासंगिकता और उपयोगिता


               श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति की आधारशिला है और सभी वेदों के सार और तत्वों को समाहित करती है। सबसे प्रसिद्ध, पोषित, क़ीमती, और धार्मिक, शास्त्रीय संस्कृत साहित्य कविता। भारतीय संस्कृति की जीवंतता, श्रीमद्भागवत गीता में जीवन का सार समाहित है। गीता मनुष्यों को सामाजिक, प्लेटोनिज्म, आध्यात्मिक श्रम, सबसे महत्वपूर्ण कार्य उपलब्धियों के अभ्यास की एक चरण-दर-चरण समझ प्रदान करती है; आत्मविश्वास; गलत कामों का त्याग; उचित असाइनमेंट की प्राप्ति; उत्कृष्ट संतुलित आहार; मानसिक विकारों से मुक्ति; यज्ञ से लगाव, जप, तप, दान; कार्रवाई और निष्क्रियता का ज्ञान; निस्वार्थ कार्य की उत्कृष्टता; कार्रवाई और भक्ति और भी बहुत कुछ। वर्तमान पीढ़ी का जीवन आधुनिकतावाद के साथ उनके लिए स्वयंसिद्ध और अध्यात्मवाद और समाजवाद के पूरी तरह विरोध में है। वैज्ञानिक विकास और उच्च कोटि की सुख-सुविधाओं की चाहत में आज जीवन हर इंसान को निरपेक्ष और संपूर्ण लगता है।
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                        मानवता भूल जाती है कि शारीरिक गतिविधि की कमी उन्हें बीमारियों की ओर ले जाती है। विकास की रफ्तार में आधुनिक सुविधाओं से लदा देश भी उतना ही बेचैन और वेदना से भरा है। हालांकि, जीवन की विडंबना यह है कि मनुष्य इन भौतिकवादी सुविधाओं की चाह में वास्तविक दुनिया, सुख और उल्लास से बहुत दूर जा रहा है। यह उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है कि भारत और अन्य विकसित देश विकसित और आधुनिक मानते हुए, इस भ्रम के नतीजों को प्रदर्शित करने के लिए एक-दूसरे का पीछा करते हैं। समकालीन युग परमाणु युद्ध की भयावहता से भयभीत है; घृणा की भावना मनुष्य के हृदय में अपना स्थान बना लेती है। आज का मानव प्रगतिशील है फिर भी भ्रमित है; स्वार्थ उन्हें अपने कर्तव्यों को निभाने से रोकता है और इस स्थिति में हर इंसान भटक रहा है। ऐसे समय में गीता का ज्ञान और उसका उपयोग हमारा अच्छा मार्गदर्शन कर सकता है। यह पत्र गीता की शिक्षाओं और वर्तमान परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता, महत्व और उपयोगिता पर प्रकाश डालता है। 
                        आधुनिक समय में मानव समस्याओं और उनके समाधान के लिए गीता एक प्रकार की दिव्य औषधि है जिसकी उपयोगिता शब्दों में वर्णन करना असंभव सा प्रतीत होता है, जैसा कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता को वाणी दी है। यह कहता है कि अन्य शास्त्रों को इकट्ठा करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि गाते, पढ़ते, पढ़ाते, सुनते और पढ़ते हैं, गीता ही सबका ज्ञान बिखेरती है; क्योंकि गीता सीधे भगवान के कमल रूपी होठों से निकलती है। गीता के संदेश हिंदू धर्म का दार्शनिक आधार होने के कारण सार्वभौमिक स्थिति रखते हैं। गीता व्यापक रूप से वैदिक दर्शन का सार प्रस्तुत करती है और धर्म और नैतिकता का पाठ देती है, और भक्ति का मार्ग, ईश्वर की भक्ति सिखाती है। श्रीमद्भागवत गीता, जहां भागवत का अर्थ है 'भगवान का' और गीता का अर्थ है 'गीत'; इस प्रकार, भगवान के गीत इसकी उपयोगिता बताते हैं। श्रीमद्भागवत गीता, महाभारत युद्ध के कगार पर भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच एक संवाद के रूप में भगवान का एक गीत। 
                            महाभारत के भीष्म पर्व का एक हिस्सा, अपने शाश्वत और परम ज्ञान के साथ भगवान की रचना ने दुनिया भर के प्रसिद्ध विचारकों और व्यक्तित्वों को प्रेरित और प्रेरित किया है। महात्मा गांधी कहते हैं कि जब उन्हें कहीं कोई आशा नहीं मिलती तो वे प्रकाश और आशा की किरण के लिए गीता में वापस जाते हैं। स्वामी विवेकानंद प्रेरणा और मार्गदर्शन के लिए गीता पर लौटने की उम्मीद करते हैं। तिलक के लिए गीता सांसारिक जीवन में मनुष्य को कर्तव्यों का पाठ पढ़ाती है; एनी बेसेंट कहती हैं, आकांक्षी आत्मा को शांति के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देती है। एक अंग्रेजी लेखक और दार्शनिक, एल्डस हक्सले के लिए, गीता मानव जाति के लिए एक स्थायी मूल्य के साथ शाश्वत दर्शन का सबसे सटीक और व्यापक सारांश है। भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्यों से ग्रंथ के विपरीत आचरण का त्याग करने और शास्त्रों के अनुसार ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए कहा। यह कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग के माध्यम से सभी प्राणियों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। भगवत गीता एकमात्र शास्त्रीय पाठ है जिस पर कई विद्वानों ने विश्व की भाषाओं में सबसे अधिक टीका, विश्लेषण, निबंध और शोध ग्रंथ लिखे हैं। गीता हमें मानव जीवन के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, व्यावहारिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं की पीड़ा को दूर करते हुए शांतिपूर्ण जीवन जीना सिखाती है, गीता को भारत और दुनिया भर में प्रासंगिक और मूल्यवान बनाती है। श्रीमद्भागवत गीता आध्यात्मिकता के लिए कई मार्ग प्रशस्त करती है जो मानव को प्रगति की ओर ले जाती है। कर्मयोग में श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्म या कर्म सभी मनुष्यों का काम करने का एक स्वाभाविक स्वभाव है। कर्म योग एक ऐसा मार्ग है जो अनजाने में या असहाय रूप से मनुष्य से कुछ न करते हुए भी जुड़ा हुआ है; एक क्षण के लिए भी निष्क्रिय रहना असंभव है। आवश्यकता है कर्म योग के रहस्य या रहस्य को बारीकी से समझने की और अध्यात्म की प्राप्ति के लिए हर कार्य में इसे लागू करने की और कार्य को पूर्णता देते हुए मन को आध्यात्मिक बनाने की; तभी मनुष्य कार्य में पूर्णता और उत्कृष्टता प्राप्त करेगा।
                         अध्यात्म सीधे मन से जुड़ता है, एकाग्रता बढ़ाता है और मन को अन्य चिंताओं या दुखों से मुक्त करता है हर काम पर पूरा ध्यान देता है क्योंकि काम है नियंत्रित भाव से पूर्ण की गई पूजा। इसके अलावा, यह आध्यात्मिकता प्रेरणादायी शक्ति का श्रेय देती है, जो समाज में एक नए मानव के रूप में उभरती है। गीता की उपयोगिता बताते हुए भगवान स्वयं कहते हैं कि निस्वार्थ भाव से अध्ययन करने वाला व्यक्ति परम सिद्धि को प्राप्त करता है। क्रिया (कर्म) में उत्कृष्ट शक्ति है; नकारात्मक ऊर्जा के तहत विनाश की क्षमता के साथ पूरी दुनिया में मानव ऊर्जा का एक सकारात्मक कार्य। जैसे महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन ने बल्ब का आविष्कार किया था। उस क्रिया का परिणाम अभी भी दुनिया के लिए उपलब्ध है और हमेशा वर्षों तक रहेगा। उनका नाम तब तक रहेगा जब तक दुनिया है। असंख्य अविष्कार हमारे लिए वरदान के रूप में हैं। आज मनुष्य को अपने देश, मानवता और स्वयं के लिए इन अनुसरणीय कार्यों की आवश्यकता है। प्राचीन ऋषियों या संतों द्वारा किए गए सभी कर्म या गतिविधियाँ और जिनकी हम आज भी प्रशंसा करते हैं, गीता हमें उन सभी विकसित कार्यों को दोहराने और प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करती है। 
                        आधुनिक सुख को परम तत्व के रूप में स्वीकार करने वाले समकालीन मानव के चारों ओर दुःख और पीड़ा व्याप्त है। एक व्यक्ति का वांछित, सुखी जीवन का मार्ग कर्म (क्रिया, कार्य या कर्म) में निहित है। बदले में परिणाम की इच्छा के बिना काम करने के लिए श्री कृष्ण उपदेश देते हैं। जब मनुष्य अपने कार्यों या कार्यों के किसी भी परिणाम की परवाह किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करता है, तो सभी ऊर्जाएं आध्यात्मिक ऊर्जा को केंद्रीकृत और उत्पन्न करती हैं। क्योंकि आध्यात्मिक शक्ति के बिना मनुष्य अपने कार्य को श्रेष्ठ और मूल्यवान नहीं बना सकता। इस ऊर्जा से संपन्न शो मानव जाति के लिए आशाजनक और पूरे अस्तित्व के लिए फायदेमंद साबित होता है। इसलिए मानव जीवन को सुखद बनाने के लिए गीता के कर्म योग को सीखने और अध्ययन करने की आवश्यकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह कोई भी कार्य अपने आचरण और पसंद के अनुसार करे और उस कार्य में लगे जिससे सुख, खुशी और संतुष्टि मिले। भूत और भविष्य की चिंताओं के विचार को त्याग कर दी गई स्थिति में अच्छी तरह से सेवा करना। गीता ईश्वर के चिंतन और कर्तव्य पालन का ज्ञान कराती है। यह इंसानों को कभी भी काम छोड़ना और केवल भगवान का ध्यान करना नहीं सिखाता है। गीता उपदेश देती है कि कर्म के द्वारा मनुष्य जीवन में सभी वांछित वस्तुओं को प्राप्त कर सकता है, लेकिन कर्म के बिना जीवन कुछ भी नहीं है या नष्ट नहीं होता है। आगे जीवन में आंदोलन के महत्व को समझाते हुए। 
                        श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उनके पास करने के लिए और कुछ नहीं है, तीनों लोकों में करने के लिए कोई कर्तव्य नहीं है; कुछ भी हासिल नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी, काम जारी है, क्योंकि काम में किसी भी तरह की रुकावट या रुकावट दुनिया को नुकसान पहुंचाएगी। इसी तरह, यदि मनुष्य अपने द्वारा किए गए कर्म को रोक दें, तो यह ग्रह को नुकसान पहुंचाएगा। भगवान कृष्ण गीता में कर्म के रहस्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि प्रकृति से प्रत्येक मनुष्य द्वारा प्राप्त गुण मनुष्य को उसके अनुसार कार्य करने के लिए मजबूर करते हैं। मनुष्य फल प्राप्त करता है और गुणों से कार्य करता है। ये प्राकृतिक गुण भी परिवर्तनशील हैं। यदि मानव मन प्राकृतिक गुणों से विचलित होता है, तो वह कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने में विफल रहता है, जिसका प्रमुख कारण मनुष्यों का लालच है। किसी भी परियोजना के लाभ और हानि के बारे में सोचे बिना, वे मुख्य रूप से लाभ या लाभ पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह सब उन्हें अहंकार और प्रतिस्पर्धा के साथ जारी रखने के लिए प्रेरित करता है, जिसके कारण मनुष्य हमेशा चिंतित और भयभीत रहता है। गीता उपदेश देती है कि कर्म का मूल्य गिनना ठीक नहीं; कुछ भी छोटा या बड़ा नहीं होता।
                             इस संदेश को चित्रित करता है कि परिणाम आवश्यकताओं के बारे में चिंता किए बिना दिए गए असाइनमेंट के लिए पूर्ण समर्पण के साथ पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करना है। परिणाम हमेशा उत्साहजनक होता है यदि सौंपा गया कार्य निश्चित समर्पण के साथ पूरा किया जाता है, न कि लाभ या हानि के बारे में सोचकर। कर्म को पूजा बनाओ और उसे अध्यात्म से जोड़ो, तब मनुष्य को किसी भी कार्य को पूरा करने में कोई कठिनाई नहीं होती है और वह आत्मसंतुष्ट रहता है। गीता में, श्री कृष्ण मनुष्य को हानि की चिंताओं से दूर परिणाम प्राप्त करने के लिए प्रबुद्ध करते हैं; मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीने के लिए फलों की चिंता न करके अलग होकर। इसके अलावा, जो संतुष्टि की भावना की वस्तुओं की खोज में संलग्न है और अपने मन के माध्यम से भावनाओं को नियंत्रित करता है, और बिना आसक्ति के कार्य करता है वह एक वफादार है। यदि कोई व्यक्ति स्वार्थ से रहित है और निरंतर कार्य में लगा रहता है, तो लक्ष्य को सफलतापूर्वक पार कर जाता है, और भगवान के रूप को प्राप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। ऐसे में ईमानदार लोगों को अध्यात्म और धर्म का पर्दा पहनकर समाज को ठगना नहीं चाहिए। 
                        यह प्रमाणित किया जाता है कि अच्छे कर्म और बुरे कर्म अलग-अलग फल देते हैं, और मनुष्य समाज के साथ कर्मों के आश्चर्यजनक फल से बंधा होता है। इसलिए कृष्ण अर्जुन को सुख-दुःख से रहित ग्रह जीवन जीने, कार्यों को पूरा करने और शक्ति का आनंद लेने के लिए कहते हैं। आधुनिक जीवन में मनुष्य आराम की सभी चीजों की उत्पादकता बढ़ाने का काम करता है। आधुनिक आविष्कारों का अर्थपूर्ण तरीके से उपयोग करना फायदेमंद है, लेकिन जब वे केवल सुविधा और आलस्य का प्रतीक बन जाते हैं, तो उनसे प्राप्त आराम उनके लिए अभिशाप बन जाता है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि आधुनिक मनुष्य कैसे प्राप्त करते हैं, लेकिन इस शरीर को नहीं बदल सकते, पांच तत्वों का एक मिश्रण टीएस यदि कोई नई चीज लंबे समय तक अनुपयोगी रह भी जाती है तो वह जीर्ण-शीर्ण और नष्ट हो जाती है, इसलिए वह शारीरिक श्रम करने को कहती है।
                         आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कई तरह की बीमारियां मानव जीवन को प्रभावित करती हैं। मानसिक विकृति से मनुष्य समाज से नाखुश है और कार्यों से अनजान और भ्रमित रहता है। इसके अलावा, जब कोई व्यक्ति अकेले और असुरक्षित होने के बारे में सोचता है और सोचता है, तो यह क्रोध, ईर्ष्या और घृणा को और बढ़ाता है और मनुष्यों को सभी मानसिक दोषों से पीड़ित करता है। मानसिक कमियों को दूर करने के लिए श्रीमद्भागवत गीता में मनुष्य को जप, तपस्या, यज्ञ और दान की महिमा का वर्णन किया गया है ताकि संसार में कर्मों (कर्मों या कृत्यों) में भोग, मानसिक रोगों को कम किया जा सके। इसके अलावा, भले ही ये सभी संतुष्ट करने में विफल हों, फिर भी सब कुछ सर्वोच्च शक्ति पर छोड़ दें; आत्म-संतुष्टि और आत्मविश्वास में वृद्धि के साथ मानसिक संतुलन को सुधारने के लिए निस्वार्थ कार्य शुरू करें। समकालीन मानव के पास अपने लिए समय नहीं है; वे ढलते सूरज को देखने और ऊर्जा से भरपूर होने के लिए समय नहीं निकालते हैं, जिससे कई प्रकार के स्वास्थ्य रोग शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। 
                        एक स्वस्थ शरीर एक संपत्ति है, मनुष्य की सबसे अविश्वसनीय संपत्ति है। विकार मुख्य रूप से मन में रहता है और शरीर के सभी अंगों को तितर-बितर कर उन्हें निवास स्थान बनाकर यात्रा पूरी करता है। इस प्रकार, श्रीमद्भागवत गीता उचित भोजन सेवन और सोने के समय के साथ निरंतर योग अभ्यास का ज्ञान देती है। हमेशा तामसिक या राजसिक भोजन के अलावा शुद्ध शाकाहारी (सात्विक) भोजन का सेवन करने के लिए कहता है, जिस तरह का भोजन करता है, उसका परिणाम वैसा ही होता है। यह अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए केवल सात्विक भोजन का सेवन करने का निर्देश देता है। गीता आधुनिकता की वर्तमान चकाचौंध में खोए लोगों को ऊर्जा के साथ सही रास्ते पर वापस लाने का भी मार्गदर्शन करती है। 
                            धर्मयुद्ध पर अर्जुन के शोक पर, भगवान कृष्ण सिखाते हैं कि मनुष्य को हमेशा अपने कर्तव्यों और कार्यों को फल की इच्छा किए बिना निस्वार्थ भाव से करना चाहिए क्योंकि आत्मा शाश्वत, अमर और सदाबहार है, जो भौतिक शरीर के अंत के साथ कभी नहीं मरती है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को नये वस्त्रों से बदलता है, उसी प्रकार आत्मा वृद्ध शरीर को छोड़कर नये शरीर में प्रवेश करती है। न शस्त्र आत्मा को काट सकता है, न अग्नि जल सकती है, न वायु चल सकती है, न जल भीग सकता है। यदि कोई व्यक्ति सोचता है कि आत्मा मर गई है या मार दी गई है, तो वे यह नहीं समझ सकते कि न तो यह मरता है और न ही कोई मार सकता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्यों से पीछे हटे बिना अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वों को संतोषजनक ढंग से पूरा करने में विफल रहता है तो असफलता असफलता का एक हिस्सा होनी चाहिए। अर्जुन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण समाज को यह सिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य को दिन-रात अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। 
    गीता शालीनता से ज्ञान प्राप्त करने का उपदेश देती है। ज्ञान केवल उन्हीं को प्राप्त होता है जो सहजता और शालीनता से सीखने का आग्रह करते हैं। सम्मान और नम्रता से व्यक्ति पूरी समझ हासिल कर सकता है। सीखने की जिज्ञासा का अभाव विद्वान को ज्ञान अर्जित करने से वंचित कर देता है, क्योंकि गुरु कभी भी इसके योग्य नहीं पाए जाने वालों को ज्ञान प्रदान नहीं करता है। किताबों में लिखी बातों को तार्किक रूप से तौलना जरूरी है। तीनों को मिलाने से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में लिखा, गुरु से सीखा और अनुभव। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में इंसान कभी भी अपनी दिनचर्या का पालन नहीं करता है। एक व्यवस्थित जीवन दिनचर्या का अभाव कई समस्याओं को जन्म देता है और मनुष्य को कठिनाइयों का सामना करने के लिए मजबूर करता है, इसलिए गीता नियमित जीवन का पालन करने के लिए कहती है और उन्हें शाकाहारी भोजन का सेवन करने का निर्देश देती है। शाकाहारी भोजन से स्वास्थ्य उत्तम रहता है; यह ऊर्जा, जीवन शक्ति, स्वास्थ्य, आनंद, शक्ति और आनंद को बढ़ाता है। सही मात्रा में भोजन, सोने का सही समय, जागने का उचित समय और एक दिनचर्या जीवन को सभी दुखों और बीमारियों से मुक्त करती है और कष्ट कम करती है। 
                        गीता मनुष्य को जीवन भर हमेशा एक ही इंसान रहना सिखाती है और हमें संतुलित जीवन जीने के लिए कहती है। अच्छे दिनों पर कभी घमंड मत करो और बुरे दिनों में परेशान मत होओ। जैसे सर्दी और गर्मी का चक्र सुख और दुख की प्रक्रिया का अनुसरण करता है। अत्यधिक गर्मी के बाद, अत्यधिक ठंड प्रवेश करती है और इसके विपरीत। जीवन के प्रति सकारात्मकता रखने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह शांति और शांति प्राप्त करने के लिए बुराई और लोभ, लाभ और हानि, जीत और हार का त्याग कर अपनी इच्छाशक्ति की गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास करे। 
                        अंत में, भारतीय संस्कृति के संरक्षक, श्रीमद्भागवत गीता, प्रत्येक मनुष्य को आचरण के अच्छे शिष्टाचार से अवगत कराते हैं और कर्म, भक्ति और विद्या के माध्यम से शास्त्रों में बताए गए ज्ञान को व्यक्त करते हैं। यह मानव जीवन के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, व्यावहारिक, आर्थिक और राजनीतिक कष्टों के पहलुओं को दूर करते हुए एक बेदाग, संयमित, सुखद और शांतिपूर्ण जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है।

Sunday, April 17, 2022

ECG में सीधी लाइन का अर्थ है Death

        पहले वाले ब्लॉग में आपने पढ़ा होगा-सफलता प्राप्ति हेतु बुनियादी तौर पर क्या करना अनिवार्य है।

    यदि आप मेरी उन बातों से सहमत हैं तो फिर ये ब्लॉग आपको लाभ देगा यदि असहमत हैं तो मुझे नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय लिखकर असहमति के बिंदुओं को जरूर बताएं।
आज इस कड़ी में मैं आपको की ऑफ़ सक्सेस के समस्त बिंदुओं पर प्रकाश डालूंगा जो अक्सर लोग जानते तो हैं लेकिन वे गलती कहाँ कर रहे होते हैं जिसके कारण वे एक सफल इंसान नहीं बन पाते।
    मैं आपके सामने जो बिंदु रखूँगा शायद उन शब्दों से आप अपरिचित नहीं हैं। आज में उन शब्दों का परिचय नहीं अपितु उन शब्दों की शक्ति और उनका जीवन में व्यवहार कैसे किया जाये ताकि सफलता आपके कदम चूमें।  आइये शुरू करते हैं ---
 

1. विस्तृत चिन्तन -

     हम चिंतन तो जरुरत से ज्यादा ही करने लगे हैं लेकिन सही चिंतन नहीं करते। या फिर जो चीज हमें आकर्षित करती हैं हम सिर्फ उनको शीघ्र प्राप्त करने हेतु चिंतन के बजाये जुगाड़ की व्यवस्था करने की योजना बनाने लगते हैं। ये चिंतन नहीं है। चिंतन में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओं पर निरपेक्ष रूप से गहनता के साथ विचार किया जाना चाहिए। अर्थ यही है की उलजुलूल के चिंतन के स्थान पर सटीक और पिन पॉइंटेड चिंतन किया जाये तो तो सफलता मिल पायेगी। आपने जो गोल स्वीकार किया है और फिर उसे आपने ही अचीव करने का मानस बनाया है तो फिर एक बार उस निर्धारित गोल के समस्त कोणों को गहनता से देखना और अधिक से अधिक उसके विषय में जानना बहुत ही जरुरी हो जाता है। ये कार्य आपको इसलिए करना चाहिए की आप सौ प्रतिशत अपनी सफलता को सुनिश्चित कर सकें। याद रखिये न तो अति चिंतन करना है और न ही विषय को सरल समझना है। अति सवर्त्र वर्ज़ियते। कमतर आंकलन भी हमें हार की ओर स्वतः ही लेके जाती है।
    अति चिंतन में एक अवगुण ये भी है की बहुत से ऐसे लक्ष्य आपके मस्तिष्क में आते चले जायेंगे जो कंप्यूटर में आये वायरस की भांति आपके मूल विचार या लक्ष्य की फाइल को ख़त्म कर देंगे और आप कब अपने ओरिजिनल उद्देश्य से भटक गए आपको भी पता नहीं चलेगा। परिणामतः आप करना तो कुछ चाह रहे थे लेकिन करने  की योजना कुछ और ही बनाने लग गए। आजके युवा अक्सर इस दुर्घटना का मासूमियत से शिकार हो रहे हैं।
    लक्ष्य की परिधि के बाहर जाकर चिंतन न कीजिये। अपने दायरे में ही रहना होगा।
सबसे महत्व पूर्ण जो आपको करना चाहिए वो ये कि उस चिंतन को लिपिबद्ध कर लीजिये। पेपर पर स्टेप बाई स्टेप लिखते रहें। इससे दो लाभ होंगे - एक तो आप भटकेंगे नहीं। दूसरा -आपका मस्तिष्क वही लिखेगा वो गोल आपने निर्धारित किया है।
    अतः मित्रों ! प्लीज इस पर ध्यान दीजिये क्योकि यदि ये स्टेप आपने ईमानदारी से पूरा कर लिया तो मैं ये दावे के साथ कह सकता हूँ आप सफलता के पथ पर अग्रसर हो चुके हैं।
 

2. सपने बड़े देखो - मगर खुली आँखों से -
    हो सकता है कुछ लोग कहें की हमें पहले सपने देखने चाहिए और बाद में अन्य कार्य करने चाहिए। मैं सहमत नहीं हूँ। कारण , बचपन से हम न चाहते हुए भी सपने देखते आये हैं। जब हमें सपनों का अर्थ भी ज्ञात नहीं था शायद तभी से। लेकिन वो सब हमने किये था बंद आँखों से। नींद की अवस्था में। कहिये अर्द्ध मूर्छित अवस्था में। कोई भी कार्य तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक हम अपनी खुली और चौकन्नी आँखों से देखकर न करें। निश्चित रूप से आपको बड़े सपने देखने होंगे मगर शर्त ये ही है खुली आँखों से। जब आपकी आँखे खुली होंगी तो आप आसानी न तो भ्रमित हो पाएंगे और न ही दिशा विहीन अवस्था को प्राप्त होंगे।

3. प्लान,एक्शन,प्ले ---
    तीसरा और अतिमहत्वपूर्ण बिंदु है -प्लान,एक्शन एंड प्ले। अर्थात जब आपके गहन चिंतन कर लिया ,खुली आखों से बड़े बड़े सपने देख लिए और गोल प्राप्ति के प्रति आश्वस्त हो गए तो फिर अब जो प्लान आपने फाइनल किया है उस पर एक्शन लीजिये और उसको प्ले कीजिये। अगर आप विलम्ब करेंगे तो फिर बाहरी वायरस के अटैक भी हो सकते हैं। ध्यान रखियेगा -उतावलेपन में या फिर बहुत अधिक संवेदनशील होकर कोई भी प्लान -एक्शन -और प्ले नहीं करना है। एक्शन और प्ले करना जरुरी इसलिए भी है की हम भटकाव से बच सकें वर्ना हम अपने आपसे या फिर बाहरी रायचन्दों के कारण अपने लक्ष्य को एक झटके में छोड़कर अन्य लक्ष्य की और ताकने लगते हैं और ये सिलसिला अनरवत चलने लगता है।  अतः इस बिंदु पर अपना धयान कीजियेगा तो आपको सफल होने से कोई भी अवरोध रोक नहीं सकेगा।

4. इवैल्यूएशन या रिव्यु - 

    जब आप अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु पूरी रणनीति बनाकर उसे अमलीजामा पहनाने हेतु एक्शन को प्ले कर देते हैं तो फिर ये भी बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है जिस पर आपको बड़ी सजगता के साथ कार्य करना है -मूल्याङ्कन या रिव्यु या इवैल्यूएशन।  अर्थात अपने किर्यान्वित लक्ष्य का निरंतर इवैल्यूएशन ताकि हम ये जान सकें की कही हमारे एक्शन और प्ले में कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष त्रुटि तो उत्पन्न नहीं हो गयी या फिर भविष्य में ऐसा तो होने वाला नहीं है।  इससे हम पूर्व में ही सतर्क हो सकते हैं और संभावित नकारात्मकता के विरुद्ध अपना एक्शन ले सकते हैं। कभी भी गलतफैमी का शिकार मत बनिए। ओवर कॉन्फिडेंस असफल  होने का एक जवलंत कारक है। आश्वस्त होना जरुरी है किन्तु अति आश्वश्त होना खतरनाक है।
जब आप स्वयं का  और अपने लक्ष्य का रिव्यु करते रहेंगे तो  आपको सफलता के पथ से कोई भी व्यक्ति डिगा नहीं सकता।

5. एफर्मेशन -

     यानि पुरे विश्वास के साथ ,पूरी दृढ़ता के साथ ,पूरी इच्छाशक्ति के साथ तो कार्य करना ही होगा लेकिन जीवन में सभी प्रकार की परेशानियों का दौर भी चलेगा। काली पीली आंधियां आएँगी। लगभग सभी सफल लोगों के जीवन में ये आंधियां आई हैं यदि आप भी सफलता के रस्ते पर चलोगे तो आपको भी इनका सामना कारण होगा। उस अवस्था में यदि आप सकारात्मक हैं तो आंधियां आपका बाल भी बांका नहीं कर पाएंगी। किन्तु यदि किंचित भी आपमें शातिरता या बेवफाई शेष रह गयी तो आपके पाँव उखड़ सकते हैं। कभी भी झूँठ या दुराव छिपाव का सहारा न लें। अपने साथ और अपने परिवार के साथ स्पष्ट रहें।
मित्रों ,आजके इस ब्लॉग में इतना ही लेकिन अगले ब्लॉग में मैं बात करूँगा की ऊपर जो भी बिंदु बताये हैं उनको स्वीकार को कर लें लेकिन आपकी आंतरिक स्थिति ऐसी बन ही नहीं पाती।  अगले ब्लॉग में मैं आपको बताऊंगा की आपको इसके लिए क्या करना होगा।
अगर आप मेरे से सहमत हैं तो नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें और इस ब्लॉग को अपने बच्चों,रिस्तेदारों और अन्य सोशल मिडिया पर शेयर कीजिये ताकि सभी लोग लाभान्वित हो सकें।
पुनः मिलते है अगले ब्लॉग में तब तक नमस्कार।
 

प्रोफेसर कृष्ण बीर सिंह चौहान,

जयपुर  

In ECG straight line means death

        You must have read in the earlier blog – what is fundamentally essential to achieve success. If you agree with those points of mine, then this blog will benefit you, if you disagree, then definitely tell me the points of disagreement by writing your opinion in the comment box below. Today in this episode, I will throw light on all the points of key of success which people often know but where they are doing mistake due to which they are not able to become a successful person. Perhaps you are not unfamiliar with the words I will make before you. Today, not the introduction of those words, but the power of those words and how to deal with them in life so that success kisses your feet. Let's start-- 
 
1. Extensive Thinking -
     We have started thinking more than necessary but we do not think properly. Or instead of contemplating the things that attract us, we start planning to arrange jugaad. This is not contemplation. In contemplation, both negative and positive aspects must be considered with absolute depth. The meaning is that instead of thinking of Ulzulul, if you do accurate and pin-pointed contemplation, then you will get success. The goal that you have accepted and then you have made it your mind to achieve it, then once it becomes very important to look deeply at all the angles of that fixed goal and know more and more about it. You should do this work so that you can be 100% sure of your success. Remember, neither to overthink nor to understand the subject simple. Very versatile. Underestimation also automatically leads us to defeat. There is also a demerit in overthinking that many such goals will go on coming in your mind, which like a virus in the computer will destroy the file of your original idea or goal and you do not even know when you have deviated from your original purpose. Will work. As a result, you wanted to do something but started planning to do something else. Today's youth are often innocent victims of this accident. Do not think outside the periphery of the goal. You have to stay within your limits. The most important thing you should do is to record that thought. Keep writing step by step on the paper. This will have two benefits - one, you will not go astray. Second - your mind will write only that goal you have set. So friends! Please pay attention to this because if you have completed this step honestly, then I can say this with confidence that you have moved on the path of success. 
 
2. Dream big - but with open eyes -
     Maybe some people say that we should dream first and then do other things. I don't agree. Because, since childhood, we have been dreaming even without wanting. Maybe since we didn't even know the meaning of dreams. But we did all that with closed eyes. in sleep state. Say in a semi-conscious state. No work can be successful unless we do it with our open and watchful eyes. Surely you have to dream big but the condition is this with open eyes. When your eyes are open, you will neither be easily confused nor will you get into a directionless state. 
 
 3. Plan, Action, Play --- 
    The third and most important point is plan, action and play. That is, when you have thought deeply, dreamed big with open eyes and are confident of achieving the goal, then now take action on the plan you have finalized and play it. If you delay, then external virus attacks can also happen. Keep in mind - do not do any plan - action - and play in haste or by being too sensitive. It is also necessary to do action and play so that we can avoid disorientation, otherwise we leave our goal in a jiffy due to ourselves or outsiders and start looking towards other target and this process starts uninterrupted. Therefore, if you pay attention to this point, then no obstacle will stop you from being successful. 
 
4. Evaluation or Review -
     When you make a complete strategy to achieve your goal and play the action to implement it, then this is also a very important point on which you have to work with great care - Evaluation or Review or Evaluation . That is, continuous evaluation of our implemented goal so that we can know whether there has been any direct or indirect error in our action and play or if it is not going to happen in future. This allows us to be alert in advance and take action against potential negativity. Never become a victim of misunderstanding. Overconfidence is a burning factor in failure. It is important to be confident, but being overconfident is dangerous. When you keep reviewing yourself and your goals, no one can deter you from the path of success.
 
 5. Affirmation -
     That is, with full faith, with full determination, with full willpower, you will have to work but all kinds of troubles will also go on in life. Black and yellow storms will come. These storms have come in the life of almost all successful people, if you too follow the path of success, then you will also face them. If you are positive in that state, then even the winds will not be able to spoil your hair. But if even a little bit of infidelity or infidelity remains in you, then your feet can be uprooted. never lie or Don't resort to gap concealment. Be clear with yourself and your family. Friends, this is all in today's blog, but in the next blog I will talk about accepting whatever points have been mentioned above, but your internal condition cannot be made like this. In the next blog I will tell you what you have to do for this. If you agree with me, then definitely write your opinion in the comment box below and share this blog on your children, relatives and other social media so that everyone can be benefited. See you again in the next blog till then hello. 

Professor

 Krishna Bir Singh Chauhan, 

Jaipur

Friday, April 15, 2022

अपने उद्देश्य को या अपने टारगेट को कैसे प्राप्त करें

            विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है ,लगभग सभी विद्यार्थियों और युवाओं के मन मस्तिष्क में ये प्रश्न अक्सर कौंधता रहता है। वे ऐसा कोई सुगम तरीका या रास्ता खोजने की तलाश में रहते हैं जिसके द्वारा उनको सौ प्रतिशत सफलता मिल जाये और वे मनोवांछित परिणामों को प्राप्त कर औरो से आगे निकल जाएँ। रात रात चिंतन करते हैं , विभिन्न लोगों से सफलता के सूत्र जानने का उद्योग करते हैं लेकिन फिर भी सफल नहीं हो पाते।
मैं अभी आपको उस गुप्त फार्मूले को उजागर करने वाला हूँ जिसके प्रयोग से कोई भी व्यक्ति सफलता की जितनी सीढियाँ चढ़ना चाहे आराम से चढ़ सकता है।
आपको मेरी बात सिर्फ सुनना ही नहीं है अपितु तुरंत प्रभाव से उसे लागू भी करना है। अक्सर हम सुनकर तुरंत ये निर्णय ले लेते हैं की कल सुबह ब्रह्म मुहूर्त से में ये पूरे लगन के साथ शुरू करता हूँ किन्तु न वो सुबह आती है और न ही शुभ मुहूरत। इसलिए आपने यदि पूर्व की भांति अपने की सलाह मान ली तो फिर प्लीज मेरे ब्लॉग को तुरंत बंद कर दो और फिर कभी भी इस ब्लॉग पर मत आना।  लेकिन यदि आप आत्मिक रूप से मजबूत हैं और वास्तव में समस्या का समाधान चाहते हैं तो फिर मैं आपकी पूरी सहायता करूँगा -
 

१. सबसे पहले तो आप अपने मन का  अपने आत्मिक मन्दिर  में प्रवेश वर्जित कर दीजिये। मन बड़ा नाटक बाज है,धूर्त है , ठग है ,दुष्ट है ,धोखेबाज है ,बेवफा है ,ये समझ लीजिये की आपका सबसे खतरनाक दुश्मन है अतः आप अभी तक उसके चंगुल में फंसे हुए थे लेकिन ईश्वर की कृपा से आप आज मेरे इस ब्लॉग के माध्यम से उस अवसर को प्राप्त करने जा रहे हैं जो की आपको सफलतम व्यक्ति बनाने की पूरी गारंटी देता है।  तो आपको मन की नहीं अपितु अपनी आत्मा की माननी है।
 

२. अपने आपको एक सैनिक की भांति अनुशासित कीजिये ,यानि जो कार्य करना है बस उसे करना ही है। अक्सर मन के अनुकूल चलने पर हम आलस्य ,हताशा और निराशा से बाहर आ ही नहीं पते या फिर स्वयं को अनुशासन के दायरे से बहुत अलग करके जीने लगते है।  टाइम टेबल तो रोजाना बनाते है ,कुछ पाने के लिए केवल कागजी दौड़धूप भी करते हैं लेकिन मोबाइल या लैपटॉप पर फिर वो सब साधन ढूंढने में व्यस्त हो जाते हैं जिनके द्वारा हम सफल होना चाहते हैं।
     मित्रो ,अनुशासन के बगैर आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
 

३. अपने गोल के प्रति प्रबल इच्छाशक्ति उत्पन्न कीजिये। इतनी प्रबल की उसके बाहर आपको संसार में कुछ भी दिखाई न दे। हम अर्जुन का उदाहरण दो खूब देते हैं लेकिन कभी इस बात पर चिंतन नहीं करते की अर्जुन के मस्तिष्क और नेत्रों का अपनी आत्मा के साथ जो सिंक्रोनाइजेशन था वो कैसे प्राप्त करें। अर्जुन की वो दृष्टी हमारे किस काम की , हाँ हमें तो अपनी दॄष्टि को अर्जुन की दृष्टी की भांति बनाना है।  उसके लिए आप अपने लक्ष्य को हमेसा अपने सामने रखें।  सोते जागते ,यहाँ तक की तब आप वाशरूम में होते हैं तब भी आपका लक्ष्य आपके साथ ही होना चाहिए।  
 

४. समय को टाईमटेबल में मत बांधने का प्रयास कीजिये। समय को टाईमटेबल में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता के अलावा कुछ भी नहीं। अपने आपको भ्रमित करने का सबसे सरलतम तरीका है। तो फिर क्या करें ?
समय का सदुपयोग कीजिये। यानि आपकी एक सेकंड भी बेकार न जाये।  समय से बड़ा कोई भी धन या संपत्ति नहीं है अतः समय को व्यर्थ में खर्च न करें। समय का तो तुरंत उपयोग करना शुरू कर दीजिये। जब आप समय का उपयोग करना शुरू कर देंगे तो देखना समय आपका इज्जत देना शुरू कर देगा। आपका साथ देना शुरू कर देगा।
 

५. हमेशा सकारात्मक रहिये। नकारात्मक विचार अपने मस्तिष्क में न आने दीजिये। ऐसे मित्रों ,सगे -सम्बन्धियों या रिस्तेदारों से दूरी बना ले जो नेगेटिव हैं।

मित्रों ! अगर आप मेरी बात से सहमत हैं और मेरी बताई टिपस को  वास्तव मैं अपनाना चाहते हैं तो फॉर नीचे कमेन्ट करके बताएं ताकि मैं आगे की कुछ और टिप्स आपको बता सकूँ। आप मुझे मेल कर सकते हैं या फिर मुझे व्हाट्सप्प पर मैसेज दे सकते है।
आज इतना ही।  ........ फिर मिलता हूँ। ........
आपका
प्रोफेसर कृष्ण बीर सिंह
9413970222
professor.kbsingh@gmail.com

How to achieve your objective or your goal

                       The subject is very important, this question often flashes in the mind of almost all the students and youth. They are in search of finding such an easy way or way, by which they can get hundred percent success and they can get ahead of others by achieving the desired results. We meditate night and night, do the industry of knowing the sources of success from different people, but still cannot be successful. 

    Right now I am going to reveal to you the secret formula, using which any person can easily climb as many stairs of success as he wants. You not only have to listen to me but also implement it with immediate effect. Often we take this decision after hearing that tomorrow morning from Brahma Muhurta I start it with full dedication but neither morning nor auspicious time comes. 

    Therefore, if you have accepted your advice as before, then please close my blog immediately and never come to this blog again. But if you are spiritually strong and really want to solve the problem then I will do my best to help you -

 

1. First of all, you should bar your mind from entering your spiritual temple. Mind is a big drama hawk, sly, thug, wicked, deceitful, unfaithful, understand that you are your most dangerous enemy, so you were still trapped in its clutches, but by the grace of God, you are in my blog today. 

    Through this you are going to get that opportunity which is absolutely guaranteed to make you the most successful person. So you have to believe not of the mind but of your soul. 

 

2. Discipline yourself like a soldier, that is, the work that has to be done has to be done. Often, when we walk according to the mind, we do not come out of laziness, frustration and despair or we start living ourselves very far from the realm of discipline. Time tables are made daily, to get something, they also do paperwork, but on mobile or laptop, then they get busy in finding all the means by which we want to be successful. Friends, without discipline you will not be able to move even a step forward.

 

3. Build strong willpower towards your goal. So strong that outside it you cannot see anything in the world. We give two examples of Arjuna but never think about how to achieve the synchronization of Arjuna's mind and eyes with his soul. What is the use of Arjuna's vision for us, yes we have to make our vision like that of Arjuna. For that, you should always keep your goal in front of you. Waking up to sleep, even when you are in the washroom, your goal should be with you. 

4. Try not to tie the time in the time table. Binding time in a timetable is nothing but the biggest foolishness. The easiest way is to confuse yourself. Then what to do? Make good use of the time. That means not a single second of yours should be wasted. There is no wealth or wealth greater than time, so do not waste time in vain. Start utilizing the time immediately. When you start using time, watching time will start respecting you. Will start supporting you.

 5. Always be positive. Don't let negative thoughts enter your mind. Keep distance from such friends, relatives  who are negative. friends! If you agree with me and I really want to adopt the tips given by me, then do comment below so that I can tell you some more tips. You can mail me or message me on whatsapp. That's all today. ....... I'll see you again. , 

Yours 

Professor Krishna Bir Singh 

9413970222

 professor.kbsingh@gmail.com

Wednesday, April 13, 2022

सफलता के सूत्र


        रतन टाटा का नाम कौन नहीं जनता ? लेकिन क्या आप जानते हैं रतन को रतन टाटा बनने के लिए क्या क्या करना पड़ा ? रतन टाटा एक खुद्दार किस्म के सच्चे हिंदुस्तानी हैं। उन्होंने होटल में बर्तन साफ़ करने से लेकर और भी बहुत से छोटे मोटे कार्य अपने जीवन में किये है तब जाकर वो आज हमारे सामने रतन टाटा के रूप में हैं।
रतन टाटा कहते हैं -
"लोहे को कोई भी वस्तु समाप्त नहीं कर सकती लेकिन उसकी खुद की जंग ही उसका अस्तित्व समाप्त कर देती है। "
    आज मैं आपके साथ कुछ वो ही चर्चा करने वाला हूँ जो आपकी सफलता के रस्ते में रोड़ा बनकर खड़े हो गए हैं।
शायद ही कोई इन्सान हो जो अपने जीवन में सफलता को पाना नहीं चाहता हो। कुछ लोगों को ये कहते हए भी सुना होगा की हम मेहनत तो खूब करते हैं लेकिन न जाने हम सफल क्यों नहीं हो पाते।
    या फिर कुछ लोग सिस्टम को ,समाज को ,परम्पराओं को भी कोसने लगते हैं।  लेकिन ये सब हताशा का ही प्रदर्शन है। वास्तव में हम अपनी मूल गलतियों को या तो जानते नहीं हैं या फिर जानकर भी हम उस पथ पर चलने के लिए बहाने बना कर टालमटोल करते हुए वो रास्ता इख्तियार कर लेते हैं जो हमें शारीरिक और मानसिक सुकून देता है। घर ,परिवार व् अन्य लोगों को लगता है की आप बहुत मेहनत कर रहे हैं।
    आज में सिर्फ आपको चेतावनी के साथ ये कहने आया हूँ कि सबसे घातक स्थिति वो होती है जब व्यक्ति खुद को ही भ्रमित करके सफल होने के संगीन सपने देखने लगे।
मित्रों , अगर आप सफलता की सीढ़ी या वे कारगर विधियां जानना चाहते हैं जिनको यदि आपने अपना लिया तो फिर नीचे कमेन्ट करके बताएं ताकि मैं आपके साथ बहुत ही विस्तृत रूप से उन तमाम बिंदुओं पर चर्चा करूँ और आपको सफलता के सूत्र बताऊँ।  आप मुझे मेरे
आप मुझे मेरी इस मेल पर भी सूचित कर सकते हैं

success formula


     Who does not know the name of Ratan Tata? But do you know what Ratan had to do to become Ratan Tata? Ratan Tata is a sincere kind of true Hindustani. He has done many small tasks in his life from cleaning utensils in the hotel, then he is in front of us today in the form of Ratan Tata.

 Ratan Tata says - 

"Nothing can destroy iron, but its own rust destroys its existence."

     Today I am going to discuss with you only those things which have stood as an obstacle in the way of your success. There is hardly any person who does not want to achieve success in his life. You must have heard some people saying that we work hard but don't know why we are not able to succeed. Or some people start cursing the system, society, traditions also.

     But all this is just a display of desperation. In fact, we either do not know our original mistakes or even knowing that, we avoid making excuses to walk on that path and adopt the path which gives us physical and mental comfort. Home, family and other people feel that you are working very hard. 

    Today I have come to tell you only with a warning that the most fatal situation is when a person starts dreaming of being successful by confusing himself. 

    Friends, if you want to know the steps to success or those effective methods, which if you have adopted, then tell me by commenting below so that I can discuss all those points in very detail with you and tell you the formulas of success.  You can also inform me on this mail- professor.kbsingh@gmail.com

Friday, April 8, 2022

व्यक्तित्व विकास के सन्दर्भ में- बौद्धिक ज्ञान मीमांसा दर्शन और जीवन In the context of personality development - intellectual epistemology, philosophy and life


             दर्शन के प्रति प्रेम  एक बेहतर जीवन की ओर ले जाता है। शायद आपको कुछ अंदाजा है कि आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है, क्या आपने कभी ऐसा बयान दिया है जो इसे सारांशित करता है? आप एक लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए दैनिक विकल्प चुनते हैं। छोटे लक्ष्य आपके दिनों का मार्गदर्शन करते हैं, जबकि दीर्घकालिक लक्ष्य आपके जीवन के महीनों और वर्षों का मार्गदर्शन करते हैं। वे सभी लक्ष्य आपके मूल मूल्यों पर आधारित होते हैं, जो आपके द्वारा जीने वाले नियमों को निर्धारित करते हैं। उन नियमों को आपके व्यक्तिगत दर्शन के रूप में जाना जाता है। इनमें से कुछ दर्शन आपके धर्म या संस्कृति से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन दर्शन उन ढांचे के भीतर भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होते हैं। दर्शन क्या है? प्रश्न अपने आप में एक दार्शनिक प्रश्न है। दर्शन तर्क और कारण को लागू करने के माध्यम से ज्ञान की खोज है। सुकरात ने दावा किया कि इस तरह का ज्ञान पर्यावरण के साथ बातचीत के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। सुकरात ने, विशेष रूप से, यह प्रदर्शित किया कि दर्शन विषयों की खोज से संबंधित है, हालांकि इस तरह के अन्वेषण ने शायद ही कभी इस विषय के बारे में ज्ञान बनाया हो। प्लेटो के सुकराती संवाद बताते हैं कि दर्शन आत्म-परीक्षण है, अस्तित्व की अन्य विशेषताओं की जांच करना और ज्ञान की सीमाओं की स्वीकृति है। सामान्य परिभाषा दर्शनशास्त्र यह है कि यह ज्ञान, सत्य और ज्ञान की खोज है। दरअसल, ग्रीक में इस शब्द का अर्थ ही 'ज्ञान का प्रेम' होता है। दार्शनिक चिंतन वर्तमान और भूतकाल के सभी भागों में पाया जाता है। यदि आपने कभी सोचा है कि क्या ईश्वर का अस्तित्व है, क्या जीवन का उद्देश्य है, क्या सुंदरता देखने वाले की नजर में है, जो कार्यों को सही या गलत बनाता है, या कानून उचित है या न्यायपूर्ण है, तो आपने दर्शन के बारे में सोचा है। और ये केवल कुछ दार्शनिक विषय हैं। मानव संघर्षों को हल करने की बुद्धि, नेतृत्व और क्षमता की गारंटी किसी भी अध्ययन पाठ्यक्रम द्वारा नहीं दी जा सकती है; लेकिन दर्शन ने परंपरागत रूप से इन आदर्शों का व्यवस्थित रूप से अनुसरण किया है, और इसके तरीके, इसका साहित्य और इसके विचार उन्हें साकार करने की खोज में निरंतर उपयोग में हैं। ध्वनि तर्क, आलोचनात्मक सोच, अच्छी तरह से निर्मित गद्य, निर्णय की परिपक्वता, प्रासंगिकता की एक मजबूत भावना और एक प्रबुद्ध चेतना कभी अप्रचलित नहीं होती है, ही वे बाजार की उतार-चढ़ाव वाली मांगों के अधीन हैं। दर्शनशास्त्र का अध्ययन छात्रों को इन गुणों को पूरी तरह विकसित करने की अनुमति देता है।आपका व्यक्तिगत दर्शन क्या है?” क्या आप उन्हें जवाब देना जानते होंगे? आप एक लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए दैनिक विकल्प चुनते हैं। छोटे लक्ष्य आपके दिनों का मार्गदर्शन करते हैं, जबकि दीर्घकालिक लक्ष्य आपके जीवन के महीनों और वर्षों का मार्गदर्शन करते हैं। वे सभी लक्ष्य आपके मूल मूल्यों पर आधारित होते हैं, जो आपके द्वारा जीने वाले नियमों को निर्धारित करते हैं। समस्या-समाधान, विश्लेषणात्मक, निर्णयात्मक और संश्लेषण क्षमता का दर्शन विकसित होता है जो उनके दायरे में अप्रतिबंधित और उनकी उपयोगिता में असीमित है। यह दर्शन को नेतृत्व, जिम्मेदारी या प्रबंधन के पदों के लिए विशेष रूप से अच्छी तैयारी बनाता है। दर्शनशास्त्र में एक प्रमुख या नाबालिग को लगभग किसी भी प्रवेश-स्तर की नौकरी के लिए आवश्यकताओं के साथ आसानी से एकीकृत किया जा सकता है; लेकिन दार्शनिक प्रशिक्षण, विशेष रूप से कई हस्तांतरणीय कौशल के विकास में, कैरियर की उन्नति में इसके दीर्घकालिक लाभों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।  यूथिफ्रो में, प्लेटो ने सुकरात के संवादों के माध्यम से दर्शन की प्रकृति का खुलासा किया क्योंकि वह भ्रष्ट युवकों के खिलाफ मुकदमे का सामना करने जाता है। सुकरात ने यूथिफ्रो से पूछा कि क्या वह ईश्वरीय चीजों को इतना समझता है कि वह अपने पिता पर दुष्ट काम करने का आरोप लगा सके वह आगे बढ़ता है और यूथिफ्रो को उसके लिए पवित्र परिभाषित करने की हिम्मत करता है, ताकि वह इसे अपने बचाव में लागू कर सके। यूथिफ्रो ने उसे जवाब दिया कि पवित्र न्याय की तलाश में है। वर्तमान विश्व में दार्शनिक आम तौर पर ऐसे प्रश्नों पर विचार करता है जो कुछ अर्थों में व्यापक और अन्य पूछताछ करने वालों की तुलना में मौलिक हैं, उदाहरण के लिए, भौतिक विज्ञानी पूछते हैं कि किसी घटना का कारण क्या है, दार्शनिक पूछते हैं कि क्या कार्य-कारण भी मौजूद है, इतिहासकार उन आंकड़ों का अध्ययन करते हैं जो न्याय के लिए लड़े थे, दार्शनिक पूछते हैं कि क्या न्याय है या क्या उनके कारण वास्तव में न्यायसंगत थे। दार्शनिकता का अर्थ है दार्शनिक रूप से या केवल गहराई से और चिंतनपूर्वक सोचना। एक लंबी कार यात्रा पर, जब आप स्कूल की गपशप से बाहर निकलते हैं, तो आप और आपके मित्र मनुष्य के स्वभाव पर विचार कर सकते हैं, या प्रश्न "सौंदर्य क्या है?" फिलॉसॉफाइज करना बिल्कुल फिलॉसफी करने के समान नहीं है। दार्शनिकता वास्तविकता पर एक तरह का प्रवचन है; यह अनिवार्य रूप से वास्तविकता के प्रति मनुष्य के खुलेपन के साथ जुड़ा हुआ है जिसे मौखिक रूप से व्यक्त किया जा रहा है। यह मौखिककरण कभी भी वास्तविकता से मेल नहीं खाता है, क्योंकि सभी दार्शनिक प्रवचन में एक स्थिति, एक दूरी लेना शामिल है, और इसलिए अनिवार्य रूप से संवाद है दर्शन का अध्ययन व्यक्ति की समस्या-समाधान क्षमता को बढ़ाता है। यह हमें अवधारणाओं, परिभाषाओं, तर्कों और समस्याओं का विश्लेषण करने में मदद करता है। यह विचारों और मुद्दों को व्यवस्थित करने, मूल्य के सवालों से निपटने और बड़ी मात्रा में जानकारी से जो आवश्यक है उसे निकालने की हमारी क्षमता में योगदान देता है। एक पल के लिए रुकें और उन सभी सवालों के बारे में सोचें जो आपके मन में हैं, जब आप अपने घर के ऊपर उस तारे से भरे विशाल शून्य को देखते हैं। उस समय के बारे में सोचें जब आप उन प्रश्नों में बहुत समय व्यतीत करते हैं ताकि आप कहीं नहीं पहुंच सकें और फिर अपने आप से कह सकें कि हो सकता है कि उस समय आपके प्रश्नों का उत्तर हो। आपके बारे में निश्चित नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से मेरे साथ होता है। मैंने इस उदाहरण को केवल यह समझाने के लिए लिया है कि एक तरह से या किसी अन्य रूप में हम सभी दर्शन करते हैं, यह हम में से हर एक को नहीं मिलता है या बिल्कुल समझ में नहीं आता है कि वे क्या सोच रहे हैं या इसे बेकार, समय और ऊर्जा की बर्बादी के रूप में सोचते हैं। दर्शन के विषय में, हम सीखते हैं कि हम अपने विचारों को कैसे वर्गीकृत कर सकते हैं या हम प्रश्नों को दर्शनशास्त्र की शाखाओं में कह सकते हैं और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम सीख सकते हैं कि किसी विशेष शाखा से कैसे संपर्क किया जाए; हमें विभिन्न परिसरों का निर्माण कैसे करना चाहिए और इन परिसरों की वैधता को कैसे सत्यापित करना चाहिए और ऐसा करके ही हम एक स्वीकार्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं। यह हमें यह भी सिखाता है कि हमारे दर्शन को भी आलोचना की आवश्यकता है, क्योंकि विचार तथ्य नहीं हैं, हो सकता है कि आप कुछ महत्वपूर्ण याद कर रहे हों। एपिस्टेमोलॉजी- दर्शनशास्त्र की एक शाखा जो मानव ज्ञान की उत्पत्ति, प्रकृति, विधियों और सीमाओं की जांच करती है, तत्वमीमांसा- दर्शनशास्त्र की शाखा जो पहले सिद्धांतों का व्यवहार करती है, इसमें ऑन्कोलॉजी और ब्रह्मांड विज्ञान शामिल हैं, और यह महामारी विज्ञान के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। रूपों का सिद्धांत-इस विचार पर जोर देता है कि संवेदना के माध्यम से हमें ज्ञात परिवर्तन की भौतिक दुनिया के रूप/विचारों में उच्चतम और सबसे मौलिक प्रकार की वास्तविकता होती है। कार्टेशियन संदेह- रेने डेसकार्टेस के लेखन और कार्यप्रणाली से जुड़े दार्शनिक संदेह का एक रूप, जो संदेह को उन चीजों को ढूंढकर कुछ ज्ञान के मार्ग के रूप में उपयोग करता है जिन पर संदेह नहीं किया जा सकता है। यथार्थवाद- यह सिद्धांत कि सार्वभौमिकों का वास्तविक उद्देश्य अस्तित्व होता है। सापेक्षवाद- एक सिद्धांत है कि सत्य और नैतिक मूल्यों की अवधारणाएं निरपेक्ष नहीं हैं बल्कि उन्हें धारण करने वाले व्यक्तियों या समूहों के सापेक्ष हैं। बहुलवाद- एक सिद्धांत है कि एक से अधिक मूल पदार्थ या सिद्धांत हैं। पितृत्ववाद- एक पिता द्वारा अपने बच्चों के साथ परोपकारी और अक्सर दखल देने के तरीके में व्यक्तियों के प्रबंधन या शासन की प्रणाली "हम दर्शन नहीं सीखते हैं, हम दर्शन करना सीखते हैं"  आलोचना को गले लगाना और अपने नए और अधिक परिष्कृत विचारों के साथ इसे शामिल करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। जैसा कि हम दर्शन के बारे में सीखते हैं, हम सीखते हैं कि अपने दिमाग को कैसे खुला रखना है, और यह पता चल सकता है कि आप कितने काम करने में सक्षम हैं और आप खुश रह सकते हैं। जब हम दर्शनशास्त्र का अध्ययन करते हैं, तो हमें पता चलता है कि यह केवल एक विषय नहीं है; यह कौशल का एक समूह है जिसमें गंभीर रूप से सोचना, मान्य करना, तर्क करना, संचार और ज्ञान शामिल है। मुद्दा यह है कि हम सभी दिशाओं में एक पटाखा के रूप में दर्शन करते हैं, लेकिन व्यर्थ। और तभी दर्शन का विषय आता है, अपने विचारों को एक गोली की तरह दिशा देने के लिए और आपको गंभीर रूप से सोचने के लिए ताकि आप बुलेट को सटीकता दे सकें ताकि यह बुल्स-आई पर लगे। सुकरात ने उन लोगों को अपने उत्तरों के माध्यम से दर्शन के मूल्य को प्रदर्शित किया जो सोचते हैं कि उन्हें दूसरों की जांच करने की प्रथा को बंद कर देना चाहिए और एथेंस छोड़ देना चाहिए। "... लेकिन क्या आप अपनी जीभ पकड़ सकते हैं और फिर आप एक विदेशी शहर में जा सकते हैं और कोई भी आपके साथ हस्तक्षेप नहीं करेगा? .... और अगर मैं फिर से कहता हूं कि प्रतिदिन सद्गुण, और उन अन्य चीजों के बारे में जिनके बारे में आप मुझे सुनते हैं स्वयं की और दूसरों की जांच करना, मनुष्य का सबसे बड़ा भला है और यह कि बिना जांचे-परखे जीवन जीने योग्य नहीं है।" (प्लेटो 39) सुकरात बताते हैं कि हमारे समाज में इतनी महत्वपूर्ण चीज की कमी है, क्योंकि हम केवल तत्काल संतुष्टि पर ध्यान केंद्रित करते हैं और मुद्दों के बारे में गहराई से सोचने में असफल होते हैं। वह बताते हैं कि बहुत से लोग दार्शनिक मुद्दों की उपेक्षा करते हैं और उन्हें समय की बर्बादी मानते हैं क्योंकि वे उन प्रश्नों के समाधान प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिनके उत्तर नहीं हो सकते। फिर भी, क्या यह विरोधाभास नहीं है कि जब वह सोचता है कि उनके पास उत्तर नहीं हो सकते हैं तो वह प्रश्न करता है? दर्शनशास्त्र के उपक्षेत्र दर्शन के व्यापक उपक्षेत्रों को आमतौर पर तर्क, नैतिकता, तत्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा और दर्शन का इतिहास माना जाता है। यहाँ प्रत्येक का एक संक्षिप्त स्केच है। तर्क तर्क का संबंध अच्छे और बुरे तर्क में भेद करने के लिए ठोस तरीके प्रदान करना है। यह हमें यह आकलन करने में मदद करता है कि हमारे परिसर हमारे निष्कर्षों का कितनी अच्छी तरह समर्थन करते हैं, यह देखने के लिए कि हम क्या स्वीकार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जब हम एक विचार लेते हैं, और उन विश्वासों को अपनाने से बचने के लिए जिनके लिए हमारे पास पर्याप्त कारण नहीं हैं। तर्क हमें उन तर्कों को खोजने में भी मदद करता है जहां हम अन्यथा केवल ढीले से संबंधित बयानों का एक सेट देख सकते हैं, उन धारणाओं की खोज करने के लिए जिन्हें हम नहीं जानते थे कि हम बना रहे थे, और न्यूनतम दावों को तैयार करने के लिए हमें स्थापित करना होगा यदि हमें साबित करना है (या अनिवार्य रूप से समर्थन) हमारी बात। नीति नैतिकता हमारी नैतिक अवधारणाओं का अर्थ लेती है - जैसे कि सही कार्रवाई, दायित्व और न्याय - और नैतिक निर्णयों को निर्देशित करने के लिए सिद्धांत तैयार करता है, चाहे वह निजी या सार्वजनिक जीवन में हो। दूसरों के प्रति हमारे नैतिक दायित्व क्या हैं? नैतिक असहमति को तर्कसंगत रूप से कैसे सुलझाया जा सकता है? एक न्यायपूर्ण समाज को अपने नागरिकों को कौन से अधिकार प्रदान करने चाहिए? गलत काम करने का एक वैध बहाना क्या है? तत्त्वमीमांसा तत्वमीमांसा यह निर्धारित करने के लिए बुनियादी मानदंड तलाशती है कि किस प्रकार की चीजें वास्तविक हैं। उदाहरण के लिए, क्या मानसिक, भौतिक और अमूर्त चीजें (जैसे संख्याएं) हैं, या केवल भौतिक और आध्यात्मिक हैं, या केवल पदार्थ और ऊर्जा हैं? क्या व्यक्ति अत्यधिक जटिल भौतिक प्रणालियाँ हैं, या क्या उनके पास ऐसे गुण हैं जो किसी भी भौतिक वस्तु को कम करने योग्य नहीं हैं? ज्ञानमीमांसा ज्ञानमीमांसा ज्ञान की प्रकृति और दायरे से संबंधित है। (सत्य) जानने का क्या अर्थ है, और सत्य का स्वरूप क्या है? किस तरह की चीजों को जाना जा सकता है, और क्या हम अपने विश्वासों में न्यायसंगत हो सकते हैं जो हमारी इंद्रियों के सबूत से परे है, जैसे कि दूसरों के आंतरिक जीवन या दूर के अतीत की घटनाएं? क्या ज्ञान विज्ञान की पहुंच से बाहर है?  आत्म-ज्ञान की सीमा पर हैं? संदर्भ - 1. https://philosophy-question.com/  2. https://eric.ed.gov/ 3.     https://en.m.wikipedia.org/wiki/Glossary_of_philosophy 4.  http://www.jimpryor.net/teaching/vocab/